बालिका दिवस

ष्ष्षुरू होने से पहले ही, ख्त्म कर दिया जीवन मेरा तुम पर न कोई बोझ मैं बनती, कर्ज चुकाकर जाती मैं तेरा। पूछू ये सवाल किससे, कि किस गलती की सजा सुनाई थी यदि बेट होना पाप अगर है, तो बेटी ही क्यों बनाई थी।श्
हमें हमारे देष और संस्कृति पर हमेषा गर्व रहा हैं । हजारों वर्ष से हमारे देष ने किसी दूसरे देष पर आक्रमण नहीं किया। हम हमेषा षांति प्रिय रहे है। जिन लोगों को दुनिया में कही स्थान नहीं मिला उन्हें भारत ने गले लगाया। ऐसी महान सांस्कृतिक होने के बावजूद हमारे देष में एक ऐसी बुराई है जो हमें हमारी नजरें पूरे संसार के सामने झुकाने पर मजबूर कर देती है। वो बुराई है लड़कों की तुलना में लड़कियों को समान महत्व न देना । उनके साथ अच्छा व्यवहार न करना, उनके स्वाभिमान को नष्ट करना, लड़कों की तुलना में लड़कियों का अनुपात कम होना। आज हमारा समाज इतना ज्यादा पुरूष-प्रधान हो गया है कि वह अपने घर में बेटी पैदा ही नहीं करना चाहता है। लोग सोचते है कि लड़क बडा होकर घर में पैसा लायेगा और लड़की इसके  विपरीत लेकर ससुराल जाएगी। इसी के विरूद्ध सामाजिक पक्षपात होता है। इसलिए आज के समय में यह आवष्यक है कि इन अंधविष्वासी मान्यताओं प्रथाओं को जो षहरी, ग्रामीण भागों में फैली है उनको खत्म कर दिया जाये। आज लोगों को अपने कत्र्तव्यों को समझते हुए सजग, सचेत एवं जागरूक होना होगा। आज बालिकाएँ, बालकों की तुलना में प्रत्येक क्षेत्र में समानता से खड़ी है, चाहे वह बात षिक्षा की हो या सरहद पर डटी सेना की हो। आज के इस आधुनिक युग में बालिकायें हर क्षेत्र में बालकों से आगे है। साइना नेहवालए पी.व्ही. सिंधु आदि ने भारत का गौरव बढ़ाया। निष्चित ही बेटी अपने जीवन में एक माँ, बहिन, पत्नी बनकर परिवार को संभालती है। अतः वह सम्मानीय है सरकार द्वारा भी बालिकाओं की रक्षा के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, समृद्धि योजना चलाई जा रही है। समाज को भी अपनी सोच बदलना होगा, उनके आत्मसम्मान की रक्षा करने में सहयोग देना होगा। 
बेटी भार नहीं है आधार। 
जीवन है उसका अधिकार।।
षिक्षा है उसका हथियार।
बढ़ाओ कदम, करो स्वीकार।। 

आस्था नेगी 
7वीं -ब